वो धागा(राखी)
वो रेशमी धागा बंधा उसके हाथों मे.,
जो राखी कहलाती है।।
पर शायद जिसकी बहन नहीं,
मुझे रह - रह कर चिढ़ाती हैं।।
शायददिखाना चाहती,
देख मैं बंधकर, कितनी खूबसूरत दिखती हूँ ।।
यह बतलाना चाहती हूँ,
हैं, तू किस्मत का मारा ।।
नहीं सजी तेरी कलाई मे,
क्यूंकि तेरी कोई बहन नहीं,
इसलिये तुझे चिढ़ाना चाहती हूँ ।।
मैने कहा तो मत सज मेरी कलाई मे,
फिर भी रक्षा कर जाऊँगा।।
मेरे हिन्दुस्तान की "बहन" को कोई आँख उठाकर देखे तो सही,
उसके टुकड़े - टुकड़े कर जाऊँगा।।
ना घबराऊँगा, ना पीछे हटूँगा,
ना बांधे मुझे कोई राखी फिर भी,
अपनी हिन्दुस्तान की "बेटी- बहन" की रक्षा के लिए सदैव तत्पर रहूँगा।।
एक प्यारा सा एहसास मेरी नन्ही कलम से -
(शरद भाटिया)
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