निराशा में उजेरे भी बहुत हैं Poem by Upenddra Singgh

निराशा में उजेरे भी बहुत हैं

सितारों की ज़िंदगी में अंधेरे भी बहुत हैं.
ढलती हुई शामों में सवेरे भी बहुत हैं.

खोज लो जो भी चीज जहाँ से चाहो.
कोयलों की खान में हीरे भी बहुत है.

उम्मीद की आख़िरी रोशनी भी जब बुझ गई.
हमने पाया की निराशा में उजेरे भी बहुत हैं.

मैं जो चाहता हूँ छीन लेता हूँ तकदीर से.
यूं तो मंजिलों की राह में फेरे भी बहुत है.

अपनी दुनियाँ में कहाँ महफूज़ हैं विषधर.
साँपों की गलियों में संपेरे भी बहुत हैं.

तूं क्यों नहीं लड़ता तक़दीर से ‘सुमन'.
साथ देनेवाले तो तेरे भी बहुत हैं.

Saturday, June 30, 2018
Topic(s) of this poem: hope
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Upenddra Singgh

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Azamgarh
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