दरिंदा है आदमी Poem by Upenddra Singgh

दरिंदा है आदमी

आत्मा तो मर गई ज़िंदा है आदमी.
क्योंकर कोई समझे शर्मिंदा है आदमी.


बहशतें जो खून की बारिस से तर-बतर.
उन बहशतों का यारों पुलिंदा है आदमी.


बाजों सरीखी फ़ितरत नज़रें शिकार पर.
ओ आसमां का खूनी परिंदा है आदमी.

COMMENTS OF THE POEM
READ THIS POEM IN OTHER LANGUAGES
Upenddra Singgh

Upenddra Singgh

Azamgarh
Close
Error Success