आत्मा तो मर गई ज़िंदा है आदमी.
क्योंकर कोई समझे शर्मिंदा है आदमी.
बहशतें जो खून की बारिस से तर-बतर.
उन बहशतों का यारों पुलिंदा है आदमी.
बाजों सरीखी फ़ितरत नज़रें शिकार पर.
ओ आसमां का खूनी परिंदा है आदमी.
उपर से ‘सुमन' दिखता तहज़ीब का वो मंज़र.
मैं जानता हूँ यूँ तो दरिंदा है आदमी.
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बहुत अच्छी कविता जिसमे आज के आदमी के दुरंगे व्यक्तित्व को उघाड़ा गया है.