दरिंदा Poem by Upenddra Singgh

दरिंदा

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आत्मा तो मर गई ज़िंदा है आदमी.
क्योंकर कोई समझे शर्मिंदा है आदमी.


बहशतें जो खून की बारिस से तर-बतर.
उन बहशतों का यारों पुलिंदा है आदमी.


बाजों सरीखी फ़ितरत नज़रें शिकार पर.
ओ आसमां का खूनी परिंदा है आदमी.



उपर से ‘सुमन' दिखता तहज़ीब का वो मंज़र.
मैं जानता हूँ यूँ तो दरिंदा है आदमी.

COMMENTS OF THE POEM
Rajnish Manga 01 July 2018

बहुत अच्छी कविता जिसमे आज के आदमी के दुरंगे व्यक्तित्व को उघाड़ा गया है.

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Azamgarh
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