पागल हुई ज़वानी Poem by Upenddra Singgh

पागल हुई ज़वानी

पागल हुई ज़वानी दिल्ली में देखो यारों.
आँखों का मरा पानी दिल्ली में देखो यारों.

पतलून फाड़कर अब पैबंद लग रहे हैं.
हैरत में राजधानी दिल्ली में देखो यारों.

ज़ुल्फों में रंग भर के उड़ती हैं तितलियाँ.
तहज़ीब ये नुरानी दिल्ली में देखो यारों.

चुन्नी चलन से बाहर तन पर सिकुड़ते कपडे.
मुन्नी हुई सयानी दिल्ली में देखो यारों.

तेरी बहन व माँ की हर बात में करतें हैं.
शोहदों की बदजुबानी दिल्ली में देखो यारों.

ज़ुल्फों की कटिंग खुद के मुँह को चिढ़ा रही है.
फैशन की ये रवानी दिल्ली में देखो यारों.

पैसों की हवस ऐसी माँ बाप अब वही हैं.
रिश्ते हुए बेमानी दिल्ली में देखो यारों.

कैसे लिखूँ ‘सुमन' मैं आँखों की और देखी.
दुनियाँ हुई दीवानी दिल्ली में देखो यारों.

Thursday, July 26, 2018
Topic(s) of this poem: madness
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Upenddra Singgh

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Azamgarh
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