चलो उठो बढ़ो कि तुमको हिन्द है बुला रहा.
सियासती बिसात पर पड़ा वो तिलमिला रहा.
साजिशों के व्यूह में पड़ा है अपना लोकतंत्र.
गर्त की कगार पर खड़ा है अपना लोकतंत्र.
छल रहा है जिसको नित्य झूठ व फरेब तन्त्र.
कैसे कह दूं यार मेरे हिन्द मेरा है स्वतंत्र?
देखो अपने हाल पर पड़ा वो बिलबिला रहा.
चलो उठो बढ़ो कि..................................
ये मशीहा इस वतन के चाल कैसी चल रहें हैं?
गिरगिटों की भांति अपना रंग ये बदल रहें हैं.
राजनीति के तवे पे सेंकते जो रोटियां.
सजा रहें हैं रहनुमा वो अपनी- अपनी गोटियां.
वर्षों से यारों देश में यही है सिलसिला रहा.
चलो उठो बढ़ो कि...................
युवा हो नौजवान तुम अहले वतन की शान तुम.
तुम हिन्द की तकदीर हो इस देश की पहचान तुम.
काँधों पे जिसके बैठ के उम्मीदें मचलती हैं.
कोशिशों से जिनकी फिजायें ये बदलती हैं.
भोले निरीह लोगों को ज़ालिम वो बरगला रहा.
चलो उठो बढ़ो कि........................
इसा देश के तुम्ही हो अब राम-कृष्ण गाँधी.
भटके हुए इतिहास को जिसने नई दिशा दी.
वो कंस और रावण फिर सिर उठा रहें है.
अहले वतन की आबरू देखो लुटा रहें हैं.
वो गद्दार मीरजाफर देखो है गुल खिला रहा.
चलो उठो बढ़ो कि...................
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