सब सेना Poem by Karthik Moyye

सब सेना

देश जो विदेश से निपट जो आई,
राम, बलराम के पाव चल करी,
चंद्रगुप्त, चाणक्य के सहायी,
ज्ञान, दन मैं सब पर छाई।

नामामृत नव जात कहआई,
सुनी जन मैं जग जीवुत्साही,
करत नमन जन दिन पर बारी
सो सत वदन चरित गहायी।

गांधी सहित अनेकों वीरा,
जो करी जीवन सब रज कारा,
पतली पुत्र, मगद महा राज्या,
स्तपीथ होई मात्र के वजह।

आर्यभट, एक अरुद विचारी,
सुन्य कोज कर जगही करारी,
मुनि कनद कोज अनु जो सारी,
नाम जा बैठ विदेश को सारी।

मात्र भूमि मंगल प्रदायी,
महान चमक जो चंद्र समानई,
कष्ट सहत कर सहन स्वदेशाह,
सब जन कर पूज्य तुम्हारा।

चंद्र किरण सम छाया सारा,
अनेक वीर जन पर जो छाया,
नाम न मिले पर नमक तुम्हारा,
सत सत वदन मै अमर तुम सारा।

POET'S NOTES ABOUT THE POEM
It's all about Thanksgiving to freedom fighters and spot lighting that everyone is a soldier.
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