न साथी न संगी कोई
न सखी न सहेली,
उस रात वह थी
अकेली ही रोई,
...
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आपने निर्भया सहित उन सभी बच्चियों की ओर से जिन्हें वहशियों की दरिंदगी का शिकार होना पड़ा है, देशवासियों और देश के कर्णधारों से कलेजा चीर देने वाला प्रश्न किया है, जिसका जवाब शायद किसी के पास नहीं है. सख्त क़ानून और सज़ा-ए-मौत का डर भी उद्दंड व्यक्तियों के दुस्साहस पर अंकुश नहीं लगा पा रहा. उल्टे, क़ानून के रखवाले भी कई बार इन अपराधों में लिप्त पाए गए हैं. धन्यवाद.
यदि आप मुनासिब समझें तो मेरी कविता 'आपकी निर्भया' भी पढ़ें और अपने विचारों से अवगत करायें. आपकी कविता से कुछ शब्द: - निर्भया-क्या वाकई जीत गई? बेटियाँ चाहे एवरेस्ट फतह करे या चाँद इससे कुछ फर्क ना पड़ता तो शायद मैं कह पाती हाँ- निर्भया- आज वाकई जीत गई।