गोपालपुर की माटी Poem by Upenddra Singgh

गोपालपुर की माटी

सपनों में मेरे आती गोपालपुर माटी।
प्यार मुझ पे है लुटाती गोपालपुर की माटी।


माना कि गाँव सीधा पहले सा अब नहीं है।
फिर भी मुझे लुभाती गोपालपुर की माटी।


मुझको वो माँ सी प्यारी जिसने जनम दिया।
मुझे लोरियाँ सुनाती गोपालपुर की माटी।


इसकी महक वहाँ से दिल्ली तलक है आती।
गीत बचपन के मेरे गाती गोपालपुर की माटी।

Sunday, September 30, 2018
Topic(s) of this poem: feelings
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Upenddra Singgh

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Azamgarh
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