गोपालपुर बेहाल हो Poem by Upenddra Singgh

गोपालपुर बेहाल हो

हमार गउवाँ गोपालपुर बेहाल हो.
कइलय रजनीतिया एइसन ई हाल हो.


इहवाँ क उहवाँ करति बा हरजाई.
गउवाँ में दिहल ई आग हो लगाई.
बबुआ कवन कहीं तोहसे हालचाल हो.
हमार गउवाँ गोपालपुर बेहाल हो.


बँटलय हवा-पानी बँटलय मुहल्ला.
रात-दिन छिनरी मचावे ले हल्ला.
बदलि दिहल लोगवन क चाल हो.
हमार गउवाँ गोपालपुर बेहाल हो.


झोंटा खोलि नाचति बा ई हो पतुरिया.
गर्दन प सबके चलावति बा छुरिया.
भईल ई त जिनगी क काल हो.
हमार गउवाँ गोपालपुर बेहाल हो.


हतियारिन खूनी ईधीरवति डेरवावति बा.
कूदि-कूदि कुलटा ई रार हो मचावति बा.
राह चलत मरदमरनी ठोंकयले ताल हो.
हमार गउवाँ गोपालपुर बेहाल हो.


घूरहू कतवारू क वोटवा चोरावति बा.
अपने पसंद क परधान हो बनावति बा.
अउर उल्टय बजावति बा गाल हो.
हमार गउवाँ गोपालपुर बेहाल हो.


सीधा-साधा गउवाँ में कइल अनीतिया.
अँगना में देखा उठावति बा भीतिया.
लड़त हउवें बुढ़िया माई क लाल हो.
हमार गउवाँ गोपालपुर बेहाल हो.



केकरा के समझीं हम आपन हो मितवा.
गले मिलंय अगवाँ से गरियावें पीछंवाँ.
‘सुमन' चलति बा ई एईसन कुचाल हो.
हमार गउवाँ गोपालपुर बेहाल हो.

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