बैंक वाले Poem by Upenddra Singgh

बैंक वाले

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मुझको लोन देने मेरे घर वो आ रहे हैं।
ये बैंक वाले यारों मुर्गा फंसा रहें हैं।

हर ओर देनेवालों की लाइनें लगी हैं।
अब लेनेवाले उल्टे तेवर दिखा रहे हैं।

मायूस ना होना ये मेरे लोन बांटनेवालों।
घुसपैठिये भी मुल्क में अब घर बसा रहे हैं।

जब देना था उधार वो करती थीं मिन्न्तें।
अब बैंकवाले गुंडे चक्कर लगा रहें हैं।

आयेंगे अच्छे दिन भी 'सुमन' सब्र तो करो।
मिल रोहिंग्या के साथ 'वो' खिचड़ी पका रहें हैं।

COMMENTS OF THE POEM
Rajnish Manga 15 October 2018

व्यंग्य में पगी एक खूबसूरत रचना जिसमे वर्तमान सोच पर अच्छा कटाक्ष है.

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Azamgarh
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