मौसम Poem by Upenddra Singgh

मौसम

धुँध की चादर ओढ़े
ठिठुरता सबेरा
सूरज के राज में
ये कैसा अँधेरा?
क्या ये मौसम की आवारगी है
या सूरज की बेचारगी है
अथवा कोई षडयन्त्र है?
कहीँ ऐसा तो नहीं कि -
इसमें भी लोकतंत्र है।

Saturday, December 29, 2018
Topic(s) of this poem: weather
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Upenddra Singgh

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Azamgarh
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