बीती कइसे पूस क महीनवाँ Poem by Upenddra Singgh

बीती कइसे पूस क महीनवाँ

जड़वा में छूटेला पसीनवाँ हो रामा.
बीती कइसे पूस क महीनवाँ हो रामा.


रचि-रचि सियलीं लगलीं हो पेवना.
तबहूँ ना पुर पड़े ओढ़ना-बिछवना.
उड़ी गइलें मन क चयनवाँ हो रामा.
बीती कइसे पूस क महीनवाँ हो रामा.



हहराला पछुवाँ हाड़ हो कँपावेला.
निरबसिया अबे से करेजा सिहरावेला.
पतवा पे हउवे परनवा हो रामा.
बीती कइसे पूस क महीनवाँ हो रामा.



नाहिं ह शहरिया आपन हो डेरा.
नाम क बनल हउवे रैन बसेरा.
लउके न कवनो ठिकानवाँ हो रामा.
बीती कइसे पूस क महीनवाँ हो रामा.



ठिठुरलं बचवा कहेलं मोरी माई.
अबहीं त आवेके बा पुसवा कसाई.
चिंता में पड़ल ह परनवा हो रामा.
बीती कइसे पूस क महीनवाँ हो रामा.

Saturday, November 10, 2018
Topic(s) of this poem: winter
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Azamgarh
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