बदरा बनि गईलें पानी Poem by Upenddra Singgh

बदरा बनि गईलें पानी

मिटा दिहलें आपन उ जिनगी-जवानी.
धरती के खातिर बदरा बनि गईलें पानी.


लोगवा कहेला ना बरसेला बदरा.
गरज-तरज ई देखावेला नखरा.
लोगवा क सोच का बखानीं.
धरती के खातिर बदरा बनि गईलें पानी.



तजि दिहलें रुप-रंग भईलें दीवाना.
हो गईलें भईया ई देखा परवाना.
भईलीं इनकै पीरितिया दीवानी.
धरती के खातिर बदरा बनि गईलें पानी.


बूँद-बूँद बनि धरती में समइलें.
प्रेम क पियसिया मेदिनी क बुझवलें.
एक ह दीवाना त दूजी दीवानी.
धरती के खातिर बदरा बनि गईलें पानी.



छोड़ के सरगवा कीचड़ में समइलें.
देखा हो पीरितिया पे नौछावर भईलें.
ना ही केहू बा हो उनक सानी.
धरती के खातिर बदरा बनि गईलें पानी.

Saturday, November 10, 2018
Topic(s) of this poem: love
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Azamgarh
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