क्या करूं Poem by Upenddra Singgh

क्या करूं

मतला एक शेर और मकता

वो प्यार जताती है दिल में उतर जाती है क्या करूं?
ये दिल्ली की हवा मेरे घर में ठहर जाती है क्या करूं?


कातिल है अदा इसकी विषकन्या सी लिपट जाती है।
अहले दिल को चाक-चाक कर जाती है क्या करूं?


मुस्कराओ लोगों कि दिल्ली से दूर बहुत दूर हो 'सुमन'।
मजबूर हाँ मजबूर हूँ मैं आँख भर जाती है क्या करूं?

Saturday, November 10, 2018
Topic(s) of this poem: pollution
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Upenddra Singgh

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Azamgarh
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