दिखता है, , Poem by Vivek Ramawat

दिखता है, ,

Rating: 5.0

हाथ बढ़ाऊं कविता लिखने को,
तो कलम के बजाय खंजर दिखता है।

धुआं ही धुआं उठता है भीतर,
तबाही का मुझे मंजर दिखता है।

आईना हो चुका हूं खुद में,
और हर हाथ में अब पत्थर दिखता है।

मकान जो खुद के भीतर बसा था,
आज देखूं तो वहां खंडहर दिखता है।

बाहरी मुस्कान भले ही पहने सब,
आंसुओं का सैलाब तो अंदर दिखता है।

आंखें जो देख लो खुद की ही मैं,
तो इनमें लबालब भरा समंदर दिखता है।।

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A poem. Which every one feel.
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