मर गई हैं ख्वाहिशें और बीते दिन बहार के.
छेड़ती हो क्यों तराने तुम भला अब प्यार के.
इश्क में दिल की नहीं दिमाग की अब चल रही है.
बदले हुए हैं क़ायदे अब कुछ इस कदर संसार के.
क्या उसे दूँ क्या तुझे और क्या रखूँ ख़ुद के लिए.
बढ़ गए भाव अब कुछ इस कदर बाज़ार के.
अब बेअसर क़ानून है हैवानियत के दौर में.
तरबतर हैं खून से पन्ने सभी अखबार के.
हम कहे फुर्सत न थी और वो कहे तो चल दिए.
देखकर हम दंग हैं अंदाज़ अपने यार के.
जल गई रस्सी मगर ऐंठन अभी भी है वही.
कुछ इस कदर के हाल हैं अब सरहदों के पार के.
उगते हुए सूरज को अब तो पूजते हैं वो सभी.
बदला हुआ ज़माना रुख देखता बयार के.
साहिल से देखते थे तूफां के नज़ारे जो.
हमको सिखा रहे वो अब क़ायदे मझधार के.
करते हैं सच को झूठ झूठे को सच वो करते.
अंदाज़ निराले हैं वकीलों के कारबार के.
वो जो वो हैं मेरी कश्ती को डुबानेवाले.
मुझको बता रहे हैं ‘सुमन' अब पते पतवार के
This poem has not been translated into any other language yet.
I would like to translate this poem