चमत्कार देखिये Poem by Upenddra Singgh

चमत्कार देखिये

अब रोज नया - नया चमत्कार देखिये.
सोसल मीडिया पे लाइव बलात्कार देखिये.


जंगल में इन दिनों इस बात पर है चर्चा.
ये आदमी है कितना मक्कार देखिये.


समलैंगिकों के सपने उतरे हैं अब ज़मी पर.
२१वीं शदी का अज़ब प्यार देखिये.


माननीय उनको अब क्यों कहे जी कोई.
संसद में हो रही जो तकरार देखिये.


डिजिटल हुआ ज़माना हर ओर उजाले हैं.
घर बैठे ‘सुमन' अब तो आर-पार देखिये.

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Upenddra Singgh

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Azamgarh
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