कितना भारी है Poem by Upenddra Singgh

कितना भारी है

भावुक होना जग में जीना कितना भारी.
चुपके-चुपके दर्द को पीना कितना भारी है.


सहने की ये जिम्मेदारी अपने हिस्से लेकर के.
सहते-सहते हमने समझा सहना कितना भारी है.


तुमने कर दी तार-तार फिर से मर्यादा मेरी.
मुझसे पूछो उसको सीना कितना भारी है.


जिनके खातिर ज़ख्म हैं खाये वही दे रहें हैं ताने.
ऐसी विषम परिस्थिति में जीना कितना भारी है.


बम और बंदूक बनाई यूँ तो तूने मर-मर के.
पर हम पर तेरा खून-पसीना कितना भारी है.


कौन भगाये आलस अब कौन चाक-चौबंद करे.
मेरे जानी दुश्मन का यूँ मरना कितना भारी है.


दिल से दूर ‘सुमन' दिल्ली में वीरानी छाई है.
सावन का ये मस्त महीना कितना भारी है.

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Azamgarh
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