तनख्वाह Poem by Upenddra Singgh

तनख्वाह

बड़े मान-मनुहार के बाद मेरे घर आती है।
मगर जब आती है तो सीने से लग जाती है।
कैसे करूँ 'सुमन' शुक्रिया मैं उसका।
वो मेरी तनख्वाह जो मेरा घर चलाती है।

Sunday, August 4, 2019
Topic(s) of this poem: happiness
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Upenddra Singgh

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Azamgarh
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