तूँ बला है Poem by Upenddra Singgh

तूँ बला है

शर्म भी लज्जित हुई दुष्टे तेरे दुष्कर्म से।
कर कलंकित कुल को अपने गिर गई निज धर्म से।


गर तूँ नहीं बाप-माँ की तो क्या किसी की हो सकेगी।
वक्त देगा वो सजा तूँ चैन से ना सो सकेगी।


दूध पीकर माँ का ब्याली तूँ उन्हीं को छल रही है।
धिक्कार! ये नागन तुझे तूँ चाल ओछी चल रही है।


बाप की पगड़ी उछाली बेटियों का मान धोया।
कुलटे! तेरे धतकर्म पर पाप भी है आज़ रोया।


प्यार का लेकर सहारा स्नेह को तूने छला है।
कौन कहता है तूँ बेटी, तूँ बला है! तूँ बला है!

Sunday, August 4, 2019
Topic(s) of this poem: lust
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Upenddra Singgh

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Azamgarh
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