होली का त्योहार Poem by Shobha Khare

होली का त्योहार

भाषण की पिचकारिया, अश्वiसन के रंग
सब रंग कच्चे पड़ गए, हुआ रंग मे भंग
रंग नहीं तो क्या हुआ, मत रो प्यारेलाल
महंगाई तोआज कल, दिलपर मले गुलाल
हिन्दू मुस्लिम एक से एक हiल और चाल
दोनों के ही खून का रंग होता है लाल
भंग पिये सब मस्त है मचा रहे है शोर
ज्यो जंगल मे झूम कर नाच रहे है मोर
पिचकारी है प्रीत की, रंगो की बौछार
गले मिलने आ गया होली का त्योहार

Thursday, April 23, 2015
Topic(s) of this poem: life
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