मेरा चंचल मन Poem by Shobha Khare

मेरा चंचल मन

शुभ ज्योत्स्ना, नीरव, रजनी
बहक रहा मेरा चंचल मन
सोच रही ढिंग बैठ तुम्हारे
बिसराऊँ अपना सुनापन


देखू अपलक तेरी छवि को
तुझ से आंखे आज मिलाऊँ
तेरी चरण वंदना मे मै
अपने गीत दुख भरे गाउँ

तू छीन न ले जो दिया मुझे
यह भय अत्यधिक सताता है
भय के कारण मेरा मस्तक
तेरे सम्मुख झुक जाता है II

Sunday, May 17, 2015
Topic(s) of this poem: life
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