मेरे मीत Poem by Shobha Khare

मेरे मीत

पातपात की स्वर्णाभा मे
प्रेम तुम्हारा बोल रहा है
तनमन को दे तृप्ति, पवन मे
प्रेम तुम्हारा डोल रहा है


जब झुका तुम्हारा मुख नीचे
मेरे नयनों से नैन मिले
तब तब चरणर्बिंदु छु कर
मेरे मानस के सुमन खिले

ये मेरे मीत! प्रेम अपना
तुमने मुझ्पर है बरसाया
मै तब अतिशय आभारी हु
मैंने जो चाहा था, पाया II

Saturday, June 6, 2015
Topic(s) of this poem: life
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