शक्ति Poem by Shobha Khare

शक्ति

हे मन मेरे! दुख सहन कर
सुन ले समरसता की वाणी
लाज और भय त्याग, प्राण मे
भर चेतना जगत कल्याणी

रजनी के पश्चात प्रात का
आना नहीं टला करता है
यही सोच सत्पुरुष रात सो
तन मे नई शक्ति भरता है II

Sunday, July 19, 2015
Topic(s) of this poem: life
COMMENTS OF THE POEM
READ THIS POEM IN OTHER LANGUAGES
Close
Error Success