सो फूलों का गुच्छा मेरी प्रियतम के लिए (1- 5)
कवि तो मैं था हीं नही
न तो पता था, कविता क्या है ।
तारीफ तुम्हारे, सौन्दर्य के करते, करते
पता भी न चला, कब कवि बना मैं!
शब्दों से खेलता हूँ
और शब्दों मैं हीं डूबता हूँ ।
निहारते तेरी सौन्दर्य को
अदभूत खण्ड काव्य रचता हूँ ।
मेरी कविता के शब्द हो तुम
मेरे संगीत की ध्वनि हो तुम
मेरी आवाज की प्रतिध्वनि तुम
और दिल की धडकन भी ।
नारी सौन्दर्य की तारीफ करते करते
ध्वनि तरंगित होकर निकली
तब निर्जीव शब्द को जीवन मिला
और भाषा अभिव्यत्ति का माध्यम बना ।
सौन्दर्य प्रकृति की अधूरी होगी
अगर तुम ना होते, उनके साथ ।
कौन देखता आसमा उपर
ना हो तो, चाँद और सूरज ।
रचनाकार ः- तुल्सी श्रेष्ठ
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बहुत सुन्दर पंक्तियाँ और रचना आभार आपका बहुत - बहुत