जनगणना 2026-27 Poem by Anjum Alinagari

जनगणना 2026-27

जनगणना का काम किया
हमने न आराम किया।।

सुबह को स्कूल जाते थे ।
दिन भर ख़ूब पढ़ाते थे।
थक-हार कर घर जब आते
सेन्सस में लग जाते थे।।।

वार्ड अठारह में हम पांच।
घूम घूम कर करते जांच।
ताकि शाहिद सर के ऊपर
ज़रा सा भी न आए आंच।

कहा गया था घर न छूटे।
न ही कोई आप से रूठे

गिन रहे थे, भवन मकान
अंजुम, इल्मा, नेहा खान ।

ज़ुल्फ़िक़ार, जावेद सर
सुपर शाहीद थे रहबर ।।।
जिनका कहना मान रहे थे
जो हम सबको जान रहे थे।
बुला बुला कर बता रहे थे।
घूम घूम कर दिखा रहे थे ।
कहां से, कैसे क्या करना है
साथ वो चल कर सीखा रहे थे।

सोलह तारीख़ आया जैसे
काम में हम सब लग गए वैसे।

नज़रि नक़्शा चार बनाया,
जिसमें एक बेकार बनाया।

सारे भवन, मकान पे नम्बर।
डालते गए दुकान पे नंबर।।।

धूप में घर घर भटक रहे थे।
चलते फिरते अटक रहे थे।
गमछा छाता, टोपी चश्मा
लगा कर, पानी गटक रहे थे।

करते रहे हम ऐप्स पे काम
सुबह हो, या होवे शाम ।
रात को देर से आते थे,
खाते थे, सो जाते थे।।।।

बाइस को बंद हुआ स्कूल।
फिर बदला अपना मामूल

घर घर दस्तक देते थे ।
सबका डेटा लेते थे ।
गली गली पहचान गए
लोग भी मुझको जान गए।

चाय बिस्किट और ठंडा, पानी,
शर्बत की है अलग कहानी।

कुर्सी पर बैठाते थे
बच्चे दौर के आते थे।

पांच सौ लेकर एक मां आई ।
कहने लगी ये फिस है भाई ।।।

कभी पढ़ाया था बच्चे को।
तब कुछ आया था बच्चे को।

आप आए तो याद ये आया
आप ने अपना फ़र्ज़ निभाया।

आपको लेना होगा पैसा ।
कहां मिलेगा आप के जैसा।

बह गया मैं जज़्बातों में।
आ गया उनकी बातों में।
सोचा उस दिन रातों में।।
कितना दम है यादों में।‌ ।।।।

मक़सद मंज़िल को पाना था।
यानी अपने घर जाना था ।

शाहिद सर का है एहसान
सफ़र रहा बिल्कुल आसान।

ग़लती सुधार वो देते थे।
ख़बर खै़रियत वो लेते थे।

वक्त से पहले काम तमाम।
इसलिए तो मिला इनाम।।।।
गए त्योहार मनाने घर
काम से ख़ुश थे शाहिद सर।।।

हुई जो ग़लती दूर किया।
धूप ने चकनाचूर किया।

© अंजुम अलीनगरी, दरभंगा बिहार

POET'S NOTES ABOUT THE POEM
भारतीय जनगणना के मकानसूचीकरण पर आधारित नज़्म
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Alinagar, Darbhanga
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