दुर्योधन कब मिट पाया: भाग-36 Poem by Ajay Amitabh Suman

दुर्योधन कब मिट पाया: भाग-36

भीम के हाथों मदकल,
अश्वत्थामा मृत पड़ा,
धर्मराज ने झूठ कहा,
मानव या कि गज मृत पड़ा।
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और कृष्ण ने उसी वक्त पर,
पाञ्चजन्य बजाया था,
गुरु द्रोण को धर्मराज ने ,
ना कोई सत्य बताया था।
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अर्द्धसत्य भी असत्य से,
तब घातक बन जाता है,
धर्मराज जैसों की वाणी से,
जब छन कर आता है।
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युद्धिष्ठिर के अर्द्धसत्य को,
गुरु द्रोण ने सच माना,
प्रेम पुत्र से करते थे कितना,
जग ने ये पहचाना।
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होता ना विश्वास कदाचित ,
अश्वत्थामा मृत पड़ा,
प्राणों से भी जो था प्यारा,
यमहाथों अधिकृत पड़ा।
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मान पुत्र को मृत द्रोण का ,
नाता जग से छूटा था,
अस्त्र शस्त्र त्यागे थे वो ना,
जाने सब ये झूठा था।
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अगर पुत्र इस धरती पे ना,
युद्ध जीतकर क्या होगा,
जीवन का भी मतलब कैसा,
हारजीत का क्या होगा?
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यम के द्वारे हीं जाकर किंचित,
मैं फिर मिल पाऊँगा,
शस्त्र त्याग कर बैठे शायद,
मर कामिल हो पाऊँगा।
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धृष्टदयुम्न के हाथों ने फिर ,
कैसा वो दुष्कर्म रचा,
गुरु द्रोण को वधने में,
नयनों में ना कोई शर्म बचा।
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शस्त्रहीन ध्यानस्थ द्रोण का,
मस्तकमर्दन कर छल से,
पूर्ण किया था कर्म असंभव,
ना कर पाता जो बल से।
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अजय अमिताभ सुमन
सर्वाधिकार सुरक्षित

दुर्योधन कब मिट पाया: भाग-36
COMMENTS OF THE POEM

Caged Bird

Ajay Amitabh Suman

Chapara, Bihar, India
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