नीले गगन, हरा पर्वत और पवन
देख रहा होगा तुम्हारी राहे ।
प्रीत गीत जो तुम गाते
ठहर गई नदिया वो सव सुनने ।
अविरल बेहती नदि भी
खुदको रोककर मुझसे पुछती ।
क्यू नहीं आई तू, आज अभितक
जल क्रिड़ा करने उनके साथ ।
जब तुम चली जल के अंंडर
पारदर्शी होगया तुम्हारी आवरण ।
पहुचे सब जलचर तेरी समिप
रोक न पाया, व सब तुझे छुने को।
ललचाई तेरी देह, ठण्डा, जल देखकर
जब पहुची तू, झरने के नीचे ।
असह्य होगया, तुम्हारी वो आवरण
छीन के ले गई वो सब जल ने ।
देखकर अव्दितीय निर्वस्त्र सौदर्य
स्तब्ध हो गया सारा जगत!
अवरुध्द हो गया सृष्टि संहार
कैंसंा ये अदभूत तेरा रचना ।
रचनाकार ः- तुल्सी श्रेष्ठ
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