KALYAN SINGH CHOUHAN

Rookie - 76 Points (15-06-1968 / SIKAR)

****थाली *** - Poem by KALYAN SINGH CHOUHAN

****थाली ***
वो गीत कहाँ से गाऊंगा ।
जो सुर न बनाउंगा ॥
वो सुर कहां से लाऊंगा
जो सरगम न बजाऊँगा
वो भविष्य कहाँ से लाऊँगा
जो भ्रूण न बचाऊँगा
वो आवाज कहाँ से लाऊँगा
जो बेटी न बचाऊँगा
वो अन्दाज कहाँ से लाऊँगा
जो बेटी न पढ़ाऊँगा
वो आगाज कहाँ से लाऊँगा
जो जीवन न बचाऊँगा
वो श्रृंगार कहाँ से लाऊँगा
जो बेटी न सजाऊँगा
वो रिवाज़ कहाँ से लाऊँगा
जो रीत न बचाऊँगा
आओ, अब मिलकर एक रीत बनाएंगे
जो बजती थी वो थाली अब बजायेंगे
हवा संग गाएंगे -दिशा को सुनायेंगे
ये गीत प्रकृति के अब गाएंगे
बेटी बचाओ -बेटी पढ़ाओ तो सुन लिया
अब हो सरकारी सरंक्षण(नौकरी) हर बेटी को
ये कदम नया अब बढ़ायेंगे
बात कण-कण अब ये पहुचायेंगे
अगर बचा पाये हम बेटी
तो ही ये सृष्टि बचा पायेंगे
अरे-वो कल कहाँ से लाऊँगा
जो आज न बचाऊँगा
वो जीवन कहाँ से लाऊँगा
जो जिन्दगी न बचाऊँगा
वो सुर कहां से लाऊंगा ।
जो सरगम न बजाऊँगा ॥

kavikalyanraj@yahoo.in
99280-43855

Topic(s) of this poem: women


Comments about ****थाली *** by KALYAN SINGH CHOUHAN

There is no comment submitted by members..



Read this poem in other languages

This poem has not been translated into any other language yet.

I would like to translate this poem »

word flags


Poem Submitted: Sunday, March 8, 2015



[Report Error]