Mithilesh Dixit


ख्वाब - Poem by Mithilesh Dixit

कल भी भाग के मारे थे
आज भी भाग के मारे हैं,
रब सुने आपकी हर दुआ
हम तो दर- दर के मारे हैं.
हम ख्वाबो में ही उसको पाते हैं
ख्वाबो में ही उसको जीते हैं,
वो दूर ही रह कर खुश हमसे
हम पल-पल बिन उनके मरते हैं
हम उनसे आस लगाये बैठे हैं
जो हमसे मुह फिराए बैठे हैं,
वो इधर -उधर नज़र फिरा लिए
हम उन पर ही नज़र टिकाये बैठे हैं.

Topic(s) of this poem: love

Form: Sonnet


Comments about ख्वाब by Mithilesh Dixit

  • Akhtar Jawad (3/8/2015 12:46:00 AM)


    A beautiful poem.............................. (Report) Reply

    Mithilesh Dixit Mithilesh Dixit (2/28/2017 11:36:00 PM)

    Thanks

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Poem Submitted: Sunday, March 8, 2015



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