Akanksha Vatsa


परदेसी - Poem by Akanksha Vatsa

ज़िन्दगी का समन्दर

ठहरा-ठहरा सा है

उसकी धरती की परत पर

कुछ कोहरा-कोहरा सा है

साँसों की नाँव

न डूबती न खेती है

ठंडी -ठंडी आँहों से

पतवार धीमी-धीमी धरक लेती है

कोई पंछी तो दिखे

इस आसमान की छाँव में

दिखाए मुझे रास्ता

ले चले मुझे अपने गाँव में

याद आती है जिसकी मुझे

उस मिटटी को महसूस करा ज़रा

दम जिसकी बाहों में तोड़ना चाहूँ

उस आँचल में मुझे मेहफ़ूज़ करा ज़रा

कोरा है तुझबिन यह समय

ठहर गयी मेरे नब्ज़ों की चाल

कैसे मैं खुद को ढुँढू

जब मुझे मिल रहे जवाबों में कई सवाल

तेरा होकर तेरा नहीं

जाने यह विडम्बना है कैसी

तेरा सगे से सगा होकर भी

बन गया मैं तेरा परदेसी

Topic(s) of this poem: patriotic


Comments about परदेसी by Akanksha Vatsa

  • Rajnish Manga (3/5/2015 12:09:00 PM)


    इस बेहतरीन कविता के लिए आपको बधाई देता हूँ, आकांक्षा. प्रकृति से अठखेलियाँ करती आपकी तलाश अन्ततः प्रश्नों की भू-भुलैयां में खो जाती है और दे जाती है एक खालीपन, एक दर्द, रिश्तों का. अत्यंत प्रभावशाली. निम्नलिखित पंक्तियाँ जैसे सब कुछ कह देती हैं.
    जाने यह विडम्बना है कैसी
    तेरा सगे से सगा होकर भी
    बन गया मैं तेरा परदेसी
    (Report) Reply

    Akanksha Vatsa Akanksha Vatsa (3/7/2015 12:55:00 PM)

    shukriya

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    0 person did not like.
  • Aftab Alam Khursheed (3/5/2015 9:16:00 AM)


    परदेसी एक अच्छी कविता है इसमे जीवन के सत्य को दर्शाया गया है बहुत खूब अकांक्षा..... (Report) Reply

    Akanksha Vatsa Akanksha Vatsa (3/7/2015 12:55:00 PM)

    shukriya

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Poem Submitted: Thursday, March 5, 2015

Poem Edited: Saturday, March 7, 2015


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