बचपन में नक्शे में देखा था,
जापान कितना छोटा है,
फिर भी दुनिया उसकी बातें करती है,
और हम सोचते थे—
उसमें ऐसा क्या बड़ा है?
फिर बड़े होकर समझ आया,
राज़ ज़मीन का नहीं था,
राज़ इमारतों का नहीं था,
राज़ व्यवस्था का था।
वहाँ स्कूल भविष्य बनाते हैं,
यहाँ बच्चे कोचिंग ढूँढते हैं,
वहाँ रिसर्च पर निवेश होता है,
यहाँ सपने अक्सर रुकते हैं।
वहाँ ट्रेनें समय पर चलती हैं,
यहाँ लोग उम्मीद पर चलते हैं,
वहाँ सिस्टम गलती से सीखता है,
यहाँ गलती अक्सर दोहराते हैं।
एक छात्र रात भर पढ़ता है,
डिग्री लेकर बाहर आता है,
फिर नौकरी की कतार में
सालों तक खड़ा रह जाता है।
एक वैज्ञानिक कुछ नया बनाना चाहता है,
एक शिक्षक बदलाव लाना चाहता है,
पर कई बार संसाधनों से पहले
संघर्ष ही सामने आ जाता है।
सवाल ये नहीं कि
जापान हमसे आगे क्यों है,
सवाल ये है कि
हम पीछे क्यों रह गए?
सवाल ये नहीं कि
उनके पास क्या है,
सवाल ये है कि
हमने क्या खो दिया है?
अगर प्रतिभा की कमी होती,
तो हम चाँद तक न पहुँचते,
अगर क्षमता की कमी होती,
तो दुनिया में नाम न कमाते।
कमी लोगों में नहीं है,
कमी प्राथमिकताओं में है,
कमी सपनों में नहीं है,
कमी व्यवस्थाओं में है।
हम तुलना करने से नहीं डरते,
हम सुधार देखना चाहते हैं—
क्योंकि विकसित देश पैदा नहीं होते,
उन्हें पीढ़ियाँ मिलकर बनाती हैं।
और अगर हर बच्चा क्षमता रखता है,
तो सवाल सिर्फ़ इतना है—
क्या हमारा सिस्टम भी उतनी ही क्षमता रखता है?
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