अवसाद का काल
(अमिय कुमार)
इच्छा होती तन की, कि मिल जाऊं परछाई में,
इच्छा होती मन में कि डूब जाऊं, अश्कों की गहराई में।
इच्छा होती छोड़ दुनिया को, चले जाऊं तन्हाई में,
इच्छा होती मिटा दूं, मैं खुद की हयाती को।
इच्छा होती बना दूं, मैं खुद को दिवंगत,
इच्छा होती अहेर दू, मैं मन के उस लाल को, जिसका पोषण किया था मामताओं के प्यार ने।
तड़प रहा है मन अब मेरा, फंस कर इच्छाओं के जाल में, मर जाऊं या मार दूं इच्छाओं के काल को।
जीवन इतना तड़प भरी है, दर्द जगाने वाली, दिल की ही नहीं दिमागों को भी अवसाद बनाने वाली।
जीवन कम पड़ता, न कम होती इच्छाएं,
कुछ इच्छाएं अच्छी होती कुछ बनती बाधाएं।
जब मन के भीतर गलत विचारों के जलते अंगारे,
आग होती है इच्छाएं जहाँ राख बन जाती है मनुष्य की विचारधाराएं।
कराह रहा था मन तब मेरा, अंधकार के जाल में, अब निकला हूँ बाहर जैसे उषा की काल में।
जीवन न होता दण्ड का तुला, हम खुद कठिन बनाते हैं। इस अनमोल जीवन की तुलना, हम बर्बादी से कर जाते हैं। पूर्ति करते इच्छाओं की हम खुद भौतिक बनते जाते हैं। इस जीवन की सरल राह को दुःख का मार्ग दिखाते हैं।
परंतु होते हैं जो लौह पुरुष, जीवन की करते हैं कदर,
वो बिना डरे इस जीवन के समस्यायों का करते हैं हल। इच्छाएं उनकी भी होती, पर इच्छाओं पर काबू उनका, क्या ग़लत है क्या सही का, फर्क पता होता है सबका।
हमें पता है वर्तमान में जीवन मिला है एक, जीना चाहिए इसे हमें बिना रखे मन में कोई भेग।
जैसे जल में रह कर किया न जाता मगर से बैर, उसी तरह सृष्टि में आकर, करना मत जीवन से खेल।
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