तुम्हें देख समर्पण भाव उठतें हैं मन में
तब मेरे विचार की मलीनता धूल जाती है
विचलित मन की तीव्र गति
मृदुल भाव जैसी शून्य हो जाती है
फिर जो खिलते हैं मन में सुंदर फूल प्रेम के
उन फूलों को तुम्हें अर्पण करना चाहता हूं
मेरी इक्ष्छाएं हमेशा से तुम्हें
सर्वोत्तम उपहार देना चाहती हैं मगर
तुम रूपवान गुणवान धनवान, सब हो
कुछ शेष नहीं जो मैं तुम्हें दे पाऊं
तुम्हारे सुंदर स्वरूप को भला मैं क्या भेंट चढ़ाऊं
हां मगर मेरे जीवन में जो सादापन है
उन्हें कुछ रंग देना चाहता हूं
वक्त नहीं इतना की ढूंढू तुम्हारी अनुकृतियों को
बस सजा लूं तुम्हें हीं हृदय में
और पा लूं मन की सभी स्वीकृतियों को
इतना अधिकार देना की तुम्हें सोंच पाऊं
जो तुम से न कह सकूं उन्हें लिख पाऊं
तुम पढ़ लेना मेरे अंतर्मन के मूर्त भाव को
शायद मैं दर्पण बन तुम्हें खुद में दिखा न पाऊं
संसार का अर्थ हीं तुम हो, अब अधिक क्या समझाना
मेरी खामोशियों की सदाएँ हरदम पुकारती हैं तुम्हें,
मेरी खामोशी में छुपे जज़्बात बस समझ जाना
तुम्हें हीं लिखता, पढ़ता, सुनता सुनाता और गुनगुनाता हूं
मेरी शब्द, भाव, स्वर, राग, लय ताल सब तुम हो
जीवन के हर पन्नों में जिक्र तुम्हारी करता हूं
तुम्हारी खुशबुओं से महकता है हर पन्ना
हर शब्द को तुम्हारी यादों में भिगो कर लिखा करता हूं
अधर से प्रेम नहीं बात तुम्हारे बस होने से है
कुमुदिनी की खुशबू का संबध जिस तरह भंवरे से है
तुम सदैव उतनी हीं मेरी हो जितना चांद आसमान का
चकोर की भांति मेरी इच्छाएं तुम्हें जीवन पर्यन्त चाहेंगी
मेरे जीवन का वास्तविक अर्थ तुम्हारे होने से है ।
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आनंद प्रभात मिश्र
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