कहां से लाऊं वो सौभाग्य
कि तुम्हारे आँचल में जीवन की छांव मिले..
रेतों में प्यासे किसी तिनके की तरह
तुम कर लो आलिंगन किसी ओस की तरह
मै बन जाऊं पायल गर तुम्हारा पांव मिले..
कहां से लाऊं वो सौभाग्य
कि तुम्हारे आँचल में जीवन की छांव मिले..
सर्वस्व सुख त्याग दूं करूं याचना प्रेम की
न चाहूं स्वर्ण महल कोई, भले न जग वैभव मान मिले..
खालीपन ने जब-जब तन्हाई में डुबोया,
मझधारों में तुम बनकर पतवार मिले..
कहाँ से लाऊँ वो सौभाग्य,
कि तुम्हारे आँचल में जीवन की छाँव मिले..
युगों-युगों से भटका हूँ मैं बनकर एक प्रश्न अधूरा
तुम उत्तर बनकर आ जाओ, कर दो जीवन पूरा
जैसे तपते मरुथल को सावन की पहली शाम मिले..
कहां से लाऊं वो सौभाग्य
कि तुम्हारे आँचल में जीवन की छांव मिले...
मैं शब्द रहूं बिन अर्थ के, तुम अर्थों का विस्तार बनो,
मैं श्वास रहूं बिन स्पंदन के, तुम जीवन का सार बनो
मेरे हर अधूरे सपने को तेरे नयनों में ठाँव मिले..
कहां से लाऊं वो सौभाग्य
कि तुम्हारे आँचल में जीवन की छांव मिले..
तरसती इन आंखों को तेरे स्वप्न से ही आराम मिले
जैसे बरसों की प्रतीक्षा के बाद राधा को श्याम मिले..
बिन समर्पण है प्रेम अधूरा, बिन तुम्हारे जैसे मैं
राह भटकूं तो भटकूं पर भटकन में तुम्हारा गांव मिले..
कहां से लाऊं वो सौभाग्य
कि तुम्हारे आँचल में जीवन की छांव मिले..
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