सर ताज पगड़ी Poem by Anant Yadav anyanant

सर ताज पगड़ी

सजाया था सर ताज कभी,
थी कभी न उतरी पगड़ी,
आई कितनी आपदा पर,
न शीश झुका सर ताज कभी,
जब तक था सर ताज बना
पाई ये इज्जत सारी
सोच से परे था
उतरे न सर ताज कभी
कर जब कन्यादान गए
मांगी वो चाहत न पुरी,
हुए नीलम इस ख्वाइश पर,
शीश स्पर्श कर सर ताज कहे,
फिर न सोभित होगी ताज
आज भी उठता दिल में बडा सा तूफान है
देखते क्या हो?
कब किसका उतरा, उतरेगा पता नही

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