वो सपने, जो अपने थे
कुछ बातें, मुलाकाते थी,
कुछ भूली बिसरी यादें थीं।
सपने सब बिखर गए
याद रही बस बात रही
कुछ सपने, पूरे कुछ अधूरे थे,
कुछ अनजान, कुछ पहचान से,
कुछ उलझन, कुछ मुस्कान सी,
कुछ बनते बिगड़ते रिस्तो की
कुछ बातें अधूरी रह गई,
कुछ राते अधूरी रह गई ।
सपने बिखरे, खिलौने टूटे,
अपने रूठे, साथी छूटे,
याद रही बस बात रही,
प्यार कहीं वो छूट गया
बचपन मेरा रूठ गया।
गलियों कहीं खो सी गई
सड़के कहीं पीछे छूट गई
दरखत अब ऊंचे हो गए
अपने सब पीछे छूट गए
हसी ठिठौली भूल गए
अपने सब पीछे छूट गए
तन्हा सी अब राते हैं
अब केवल बातें हैं।
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