स्वाभिमान की लौ Poem by Anil Kumar Soni

स्वाभिमान की लौ

नीतियों के साये में जीना सादगी में रहकर,
दृण संकल्पित हैं पिता की याद में रहकर।
हमने कभी स्वाभिमान को नहीं बेचा,
हर कदम सच्चा, कभी जमीर नहीं बेचा।

गुलामी की जंजीरों में हम कभी नहीं जकड़े,
लालच के वासी भूत हो हम कहीं नहीं गिरे।
भूख से बेहाल हो जाएं, पर डरते नहीं,
पत्तों को खाकर भी जी लेंगे, मरेंगे नहीं।

शेर की तरह भूखा रहना मंजूर है,
पर घास से समझौता गवारा नहीं है।
स्वाभिमान की लौ दिल में जलती रहेगी,
हर कठिनाई में भी हिम्मत सदा बढ़ती रहेगी।

आंधियों का सामना करते हुए बड़े हुए हैं,
सत्य, न्याय, और कर्तव्य की राह पर चले हैं।
हम भटक जाएं ऐसा कभी होने नहीं देंगे,
स्वाभिमान की मशाल को हमेशा जलाए रखेंगे

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