ओर तुमसे क्या कहें Poem by Arjun Kumar

ओर तुमसे क्या कहें

रास्ते बदल लिए…
तेरी मोहब्बत को मैंने धीरे-धीरे
यूँ बुझा दिया जैसे
हवा उँगलियों के पोरों से दीया सहलाकर थका दे।

सब दे तो दिया था तुझे
अपनी रातों की नींद,
दिनों की धूप,
और उन ख़यालों की सिलवटें
जो सिर्फ़ तेरे नाम पर खुलती थीं।

अब दिल में कहने को कुछ भी नहीं बचा,
बस एक ठंडी-सी साँस है
जो हर बार तेरी याद पर धुंध बनकर जम जाती है।

और तुझे क्या कहें अब…
तू तो यूँ गुज़र गई
जैसे कोई मौसम बिना आवाज़ दिए
घर की खिड़की से निकल जाए
परदे हिलते रह जाएँ,
और कमरा खाली हो जाए।

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