रातभर मेहनत करो (एक नाट्य-स्वगत) Poem by ashok jadhav

रातभर मेहनत करो (एक नाट्य-स्वगत)

(मंच मंद रोशनी में है। एक टेबल लैम्प अकेला उजाला फैला रहा है। कागज, किताबें और स्केच बिखरे हुए हैं। वक्ता टेबल पर झुका है, हाथ में कलम, आँखें थकी हुई लेकिन फोकस में हैं।)
रात शांत है।
कुछ लोग कहते हैं—बहुत शांत।
लेकिन मुझे यहाँ सुकून मिलता है—शांति में, छायाओं में, उन क्षणों में जिन्हें दुनिया भूल जाती है।
(ठहराव)
मैंने रातभर मेहनत की है।
एक बार नहीं। दो बार नहीं।
हजारों रातें, हजारों सूरज मेरी पलकों के पीछे डूबे,
जब मैं अंक, शब्द, विचारों से लड़ता रहा…
हर विचार को अस्तित्व में ढालने की कोशिश में।
वे कहते हैं, "सो जाओ, आराम करो, रुक जाओ।"
मैं कहता हूँ, "अभी नहीं।"
जब तक यह विचार सांस नहीं लेता।
जब तक यह योजना जीवित नहीं होती।
जब तक काम योग्य नहीं बनता।
(वह झुककर आँखें रगड़ता है।)
रात क्रूर है।
यह महत्वाकांक्षा का मज़ाक उड़ाती है।
यह फुसफुसाती है, सो जाओ। कल इंतजार करेगा।
लेकिन कल अजनबी है।
कल प्रयास के लिए प्रतीक्षा नहीं करता।
कल तैयार लोगों का साथ देता है।
और आज रात—मैं तैयार करता हूँ।
(ठहराव)
समझो, रातभर मेहनत करना केवल परिश्रम नहीं है।
यह भक्ति है।
यह जुनून है।
यह उस चीज़ के लिए प्रेम है
जो अभी नहीं है,
भले ही शरीर विरोध करे
और मन नकारे।
मैंने ऐसे सवाल पूछे जो तारे भी नहीं बता सकते।
मैंने ऐसे विचारों का पीछा किया जो सूर्योदय के साथ गायब हो गए।
मैंने दोबारा लिखा, दोबारा गढ़ा, दोबारा कल्पना की,
जब तक पन्ना
मेरी अनवरत कोशिश का आईना न बन जाए।
(वह खड़ा होता है, स्वर बढ़ता है।)
थकान को व्यर्थ मत समझो।
देर रात को बर्बाद समय मत कहो।
हर प्रयास की एक चिंगारी होती है।
हर चमक ज्वाला को बढ़ाती है।
हर जलाई गई मोमबत्ती
कुछ ऐसा उजाला देती है
जो एक दिन दुनिया को रोशन करेगा।
(ठहराव, नरम स्वर)
मैंने दोस्तों को सोते देखा,
जीवन रोजमर्रा में बीतता देखा,
उत्साह मंद होते देखा।
और मैं जागा रहा,
सिर्फ़ स्याही, विचार और संभावनाओं के भार के साथ।
कुछ लोग इसे पागलपन कहते हैं।
कुछ इसे बलिदान।
मैं इसे जीवित रहने का तरीका कहता हूँ।
सपने की जीवित रहने की विधि,
लक्ष्य की जीवित रहने की विधि,
उस वादे की जीवित रहने की विधि जो मैंने खुद से किया।
(वह कागज़ उठाता है, ध्यान से पढ़ता है।)
अब यह शांत है, पर कुछ घंटों में, यह लैम्प बुझ जाएगा।
रात खत्म होगी।
दुनिया जाग जाएगी।
और जो कभी अदृश्य था—मेरी मेहनत, मेरा प्रयास, मेरी सतत सजगता—
वो उजाले में खड़ा होगा।
शायद कोई इसे नोटिस करे।
शायद कोई न करे।
लेकिन इससे फर्क नहीं पड़ता।
(ठहराव)
रातभर मेहनत करना सराहना के लिए नहीं है।
तालियों के लिए नहीं है।
पहचान के लिए नहीं है।
यह कुशलता के लिए है।
यह सृजन के लिए है।
यह उस लगातार पीछा के लिए है
जो आप जानते हैं कि हर अनसोई रात के लायक है।
(वह फिर से टेबल पर झुकता है, दृढ़तापूर्वक।)
और इसलिए मैं जलता हूँ।
मैं तब जलता हूँ जब अन्य सोते हैं।
मैं तब जलता हूँ जब दुनिया सपने देख रही होती है।
मैं तब जलता हूँ जब थकान समर्पण मांगती है।
क्योंकि तेल, स्याही, प्रयास—ये मेरे साथी हैं।
और जब तक काम पूरा नहीं होता,
जब तक सपना मजबूत नहीं खड़ा होता,
मैं पीछे नहीं हटूँगा।
मैं हार नहीं मानूँगा।
(वह आँखें उठाकर देखता है, तीव्र स्वर।)
कुछ लोग इसे जुनून कहते हैं।
मैं इसे भाग्य कहता हूँ।
क्योंकि केवल इन लंबी, शांत रातों में
असंभव संभव बनता है।
(ठहराव)
तो रात लंबी होने दो।
लैम्प झिलमिलाने दो।
दुनिया सोने दो।
मैं रातभर मेहनत करूँगा।
मैं सहूँगा।
मैं बनाऊँगा।
मैं जीतूँगा।
(रोशनी धीरे-धीरे मंद पड़ती है, केवल लैम्प की मंद रोशनी बचती है।)

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