(मंच धुंधला है। एक अकेला पात्र मंच के मध्य खड़ा है। कहीं दूर घड़ी की टिक-टिक सुनाई देती है। वह हर शब्द को तौलते हुए धीमे स्वर में बोलता है।)
तो यही है वह अनुभव—
लगाम के बिना खड़े होना,
जीवन को आगे बढ़ते देखना
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