शीर्षक: जब पन्ना पलटता है Poem by ashok jadhav

शीर्षक: जब पन्ना पलटता है

(वक्ता भोर की हल्की रोशनी में अकेला खड़ा है। आवाज़ में बीते कल का बोझ है, लेकिन भीतर कहीं एक नई दृढ़ता जन्म ले रही है।)
मैं बहुत समय तक
अपनी ही ज़िंदगी के हाशियों में जीता रहा,
जहाँ वादों की जगह
मैं बहाने लिखता रहा।
मैंने अपनी आदतों को "किस्मत" कहा,
अपनी असफलताओं को "परिस्थिति",
और अपनी कठोरता को "सच बोलना।"
कितना आसान था
दोहराव को नियति समझ लेना,
यह कह देना— मैं ऐसा ही हूँ,
और कहानी को
आगे बढ़ने से पहले ही बंद कर देना।
मैंने बीते कल को
एक वर्दी की तरह पहना—
दाग़दार, जानी-पहचानी,
कभी न धुली हुई।
हर सुबह वही पहन ली,
यह मानते हुए
कि पुराने फैसलों की बदबू
दरअसल अनुभव की खुशबू है।
मैं बदलाव की बात
ऐसे करता रहा
जैसे वह कोई अफ़वाह हो,
जो सिर्फ़
मुझसे ज़्यादा साहसी लोगों के लिए बनी हो।
लेकिन सुनो—
सबसे ज़्यादा टूटी हुई किताब भी
तभी ख़त्म होती है
जब आख़िरी पन्ना
ख़ुद मान ले।
आज रात
मैं अपने ही सामने खड़ा था
और नज़र नहीं चुराई।
मैंने देखा—
लापरवाह शब्दों से हुआ नुकसान,
टाली हुई माफ़ियों का मलबा।
मैंने देखा
कैसे मैंने चरित्र से ज़्यादा
आराम को चुना,
कैसे अंधेरे को दोष दिया
जबकि दीपक जलाया जा सकता था।
एक पल आता है—
शांत, बिना घोषणा के—
जब इनकार
सच का बोझ ढोते-ढोते
थक जाता है।
मेरा इनकार
मेरे पैरों के पास
ढह गया।
और तब
मैं असंभव सा काम करता हूँ।
मैं पन्ने के कोने को पकड़ता हूँ।
उंगलियाँ हिचकिचाती हैं—
स्याही अड़ती है,
काग़ज़ फुसफुसाता है—
फिर भी
मैं पन्ना पलट देता हूँ।
मैं नया पन्ना पलटता हूँ।
इसलिए नहीं कि अतीत
मुझे माफ़ कर देता है—
वह नहीं करता।
इसलिए नहीं कि दुनिया
सब भूल जाती है—
वह शायद ही कभी भूलती है।
बल्कि इसलिए कि
जैसा मैं था
वैसा बने रहना
अब बदलने से
ज़्यादा महँगा पड़ने लगा है।
यह नया पन्ना डरावना है।
इतना ख़ाली
कि मुझे परख सके।
छिपने के लिए कोई पंक्तियाँ नहीं,
बचाव के लिए कोई इतिहास नहीं।
अब जो भी शब्द लिखूँगा,
वे सिर्फ़ मेरे होंगे।
यहाँ माफ़ी की जगह
मेहनत होगी।
यहाँ जवाब देने से पहले
सुनना होगा।
यहाँ धैर्य
कमज़ोरी नहीं,
कठिन सीख से मिली
अनुशासन होगा।
यहाँ मैं पूछना छोड़ दूँगा—
ये सब मेरे साथ ही क्यों होता है?
और पूछूँगा—
आज मैं क्या अलग करूँगा?
इस पन्ने के पलटने को
चमत्कार मत समझना।
मैं फिर भी लड़खड़ाऊँगा।
पुरानी आदतें
दरवाज़ा खटखटाएँगी,
यह दिखाने के लिए
कि उनका कुछ सामान
अब भी भीतर है।
लेकिन अब मैं जानता हूँ—
खटखटाने का मतलब
आमंत्रण नहीं होता।
मैं अपने अतीत को मिटा नहीं रहा।
मैं उसे संपादित कर रहा हूँ।
डर और जल्दबाज़ी में लिखे
मसौदे को
सुधार रहा हूँ।
बढ़ना अतीत से ग़द्दारी नहीं—
उससे बेहतर बनने का साहस है।
तो यह पल दर्ज हो जाए—
जब मैंने
कड़वाहट की जगह ज़िम्मेदारी चुनी,
बहानों की जगह प्रयास,
और आराम की जगह बदलाव।
दुनिया चाहे मुझ पर शक करे।
मैंने खुद पर
ज़िंदगी भर के लिए
काफ़ी शक कर लिया है।
आज
मैं फिर से शुरुआत करता हूँ—
न शोर के साथ,
न पूर्णता के साथ—
बल्कि संकल्प के साथ।
पन्ना दर पन्ना।
चुनाव दर चुनाव।
मैं नया पन्ना पलटता हूँ,
और पहली बार
खुद को
गर्व के साथ
पढ़ने का इरादा रखता हूँ।

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