(वक्ता भोर की हल्की रोशनी में अकेला खड़ा है। आवाज़ में बीते कल का बोझ है, लेकिन भीतर कहीं एक नई दृढ़ता जन्म ले रही है।)
मैं बहुत समय तक
अपनी ही ज़िंदगी के हाशियों में जीता रहा,
जहाँ वादों की जगह
...
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