शीर्षक: दिल जो सामने है Poem by ashok jadhav

शीर्षक: दिल जो सामने है

(एक अकेली आकृति मंद रोशनी में खड़ी है, हल्के कांपते हुए, आँखों में आंसू चमक रहे हैं। दुनिया दूर सी लगती है, पर हर शब्द में vulnerability की गहराई है।)
क्या तुम मुझे देख रहे हो? सच में देख रहे हो? वो नकाब नहीं… वो कवच नहीं… बल्कि मैं… असली, खुला हुआ मैं? मैंने सीखा है, शायद बहुत देर से, कि छुपाना अंदर से सड़ने जैसा है। मैंने अपना दिल दबाया, अपने जज़्बात छिपाए, अपनी इच्छाओं को दफन किया… सोचा कि यह ताकत है… सोचा कि यह सुरक्षा है…
पर जीवन बिना आग के क्या है? बिना खुशी के झटकों के, बिना उस दर्द के जो याद दिलाता है कि तुम जिंदा हो? मैंने मुस्कानें पहनीं जैसे परिधान, शालीनता के इशारों को ढाल बना लिया… और फिर भी अंदर… अंदर… मेरा दिल चीख रहा था। और मैंने… मैंने इसे कैद किया।
अब नहीं। अब नहीं! मैं अब उन छायाओं में फुसफुसाए जाने वाले जज़्बातों को छिपाऊँगा नहीं, जो मेरी आग में जल रहे हैं। मैं अपना दिल अपनी बाहों पर पहनूँगा, ताकि पूरी दुनिया देख सके! उन्हें मेरे आँसू दिखेंगे, मेरी हँसी, मेरा क्रोध, मेरा प्यार… सब कुछ! अगर मैं चोट खाऊँ, तो वे घाव देखेंगे। अगर मैं उड़ूँ, तो वे पंख देखेंगे!
मैं अब यह नहीं मानूँगा कि ताकत चुप्पी में है। असली ताकत… असली ताकत… उस हिम्मत में है जो दिखाने की है कि मैं कौन हूँ… पूरी तरह से… बेझिझक… खूबसूरती से।
और हाँ… हाँ, यह दर्द देगा। ओह, यह आग की तरह जलाएगा, जब मैं अपनी आत्मा के कक्षों को उजागर करूँगा। पर मैं ईमानदारी में बहना पसंद करूँगा, बजाय कि दिखावे की ठंडी दुनिया में जीने के। उन्हें न्याय करने दो, उन्हें दया करने दो, उन्हें ईर्ष्या करने दो… मैं छुपूँगा नहीं। मेरा दिल अब फुसफुसाएगा नहीं। मेरा दिल खुले में नाचेगा, जो देखने की हिम्मत करेगा, वह मेरी असली पहचान देख सकेगा… बेपरवाह, बेझिझक, जिंदा!
तो यहाँ मैं खड़ा हूँ! कोई नकाब नहीं, कोई कवच नहीं, कोई ढाल नहीं… सिर्फ मेरी आत्मा का असली, कच्चा सच। कहते हैं, "दिल को बाहों पर पहन लो"… और हाँ, मैं पहनूँगा। मैं इसे एक ध्वज की तरह पहनूँगा, तूफान में लहराता हुआ… चुनौतीपूर्ण… दमकता हुआ… स्वतंत्र।
(रुकता है, छाती तेजी से उठती-गिरती है, आँखों में आंसू। चेहरे पर राहत की हल्की मुस्कान। रोशनी धीरे-धीरे घटती है।)

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