बुनियाद तैयार करो (एक नाट्य-स्वगत) Poem by ashok jadhav

बुनियाद तैयार करो (एक नाट्य-स्वगत)

(मंच मंद रोशनी में है। फ़र्श खाली, लगभग अधूरा सा दिखता है। वक्ता थोड़ी देर के लिए घुटनों के बल बैठता है, फ़र्श को छूता है, फिर उठ खड़ा होता है।)
शुरुआत की कोई सराहना नहीं करता।
वे केवल अंत की तारीफ करते हैं,
साफ़ रिबन,
उत्थान की ताली।
लेकिन शुरुआत—
धीमी, शांत शुरुआत—
छायाओं में होती है।
(ठहराव)
यहीं मैं खड़ा हूँ।
तारीफ से पहले।
साबित होने से पहले।
दुनिया के विश्वास से पहले।
मैं यहाँ हूँ
बुनियाद तैयार करने के लिए।
(वह फ़र्श की ओर देखता है।)
बुनियादें आकर्षक नहीं होतीं।
वे पैरों के नीचे छिपी रहती हैं,
भारी बोझ सहती हैं
बिना दिखाई दिए।
वे चमकती नहीं।
वे घोषणा नहीं करतीं।
फिर भी सब कुछ उन पर निर्भर है।
(ठहराव)
मैंने जल्दी ही सीखा
कि जल्दबाज़ी में कुछ भी टिकता नहीं।
कि बिना तैयारी के महत्वाकांक्षा
अपने ही तनाव में टूट जाती है।
मैंने दूसरों को जल्दी उड़ते देखा—
और उतनी ही जल्दी गिरते भी।
उनके मीनारें ऊँची थीं,
पर जड़ें पतली।
(वह एक कदम आगे बढ़ता है।)
इसलिए मैंने धैर्य चुना।
इसलिए नहीं कि भूख कम थी,
बल्कि इसलिए कि मैंने स्थायित्व का सम्मान किया।
मैंने पढ़ाई की।
मैंने अभ्यास किया।
मैं चुपचाप असफल हुआ।
जब दूसरे तालियों के पीछे भाग रहे थे,
मैं समझदारी के पीछे भाग रहा था।
(ठहराव)
हर छोटा प्रयास
अदृश्य महसूस होता।
हर देर रात
महत्वहीन लगती।
हर सुधार
देरी जैसा लगता।
पर जब उद्देश्य मार्गदर्शक हो,
तो देरी रोक नहीं होती।
(वह सीधा खड़ा होता है।)
बुनियाद तैयार करना
इसका अर्थ है
भविष्य में विश्वास करना
जो अभी दिखाई नहीं देता।
इसका अर्थ है निवेश करना
बिना तत्काल लाभ के।
इसका अर्थ है भरोसा करना
कि अदृश्य ताकत
एक दिन परीक्षण में आएगी।
(ठहराव)
संदेह के पल आए।
जब मौन रोकावट जैसा लगा।
जब प्रयास अपरिचित लगे।
जब हार व्यावहारिक दिखाई दी।
पर हार बुनियाद नहीं बनाती।
सिर्फ़ धैर्य ही बनाता है।
(वह गहरी साँस लेता है।)
तैयारी ही अनुशासन है।
यह लगातार प्रयास चुनना है
उत्साह की जगह।
यह गहराई चुनना है
गति की जगह।
यह बढ़ना चुनना है
सिर्फ़ चमकने से पहले।
(ठहराव)
मैंने हर ईंट सावधानी से रखी।
ज्ञान।
कौशल।
चरित्र।
मैंने दो बार मापा,
एक बार काटा।
मैंने अपनी गलतियों से सीखा,
छिपाया नहीं।
(वह दूर देखता है।)
क्योंकि जब तूफ़ान आएगा—
और आता ही है—
सिर्फ़ वही टिकता है
जो ठीक से तैयार किया गया।
(ठहराव)
बिना तैयारी के सफलता
सिर्फ़ एक अतिथि है।
तैयारी पर बनी सफलता
एक घर है।
(वह फिर से घुटनों के बल बैठता है, हाथ फ़र्श पर रखता है।)
यह ज़मीन याद रखती है
हर प्रयास को।
हर संदेह।
हर बलिदान।
एक दिन,
दूसरे इसके ऊपर खड़े होंगे
और ऊपर उठती चीज़ की प्रशंसा करेंगे।
वे इसे प्रतिभा कहेंगे।
भाग्य कहेंगे।
एक रात में सफलता कहेंगे।
वे बुनियाद को नहीं देखेंगे।
पर मैं जानता हूँ।
(वह स्थिर खड़ा होता है।)
और वही पर्याप्त है।
क्योंकि मैं तालियों के लिए नहीं बना रहा—
मैं टिकने के लिए बना रहा हूँ।
(दीर्घ ठहराव)
तो उन्हें जल्दी करने दो।
उन्हें कदम छोड़ने दो।
मैं यहीं रहूँगा—
मापता, सीखता, तैयार करता।
बुनियाद तैयार करता
ईंट दर ईंट,
भरोसा करते हुए कि समय
उनकी इनाम देता है
जो उसका सम्मान करते हैं।
(रोशनी धीरे-धीरे मंद पड़ती है।)

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