शीर्षक: "रोज़ाना के छोटे कदमों की ताक़त" Poem by ashok jadhav

शीर्षक: "रोज़ाना के छोटे कदमों की ताक़त"

(मंच पर एक अकेली आकृति खड़ी है, दूर तक नजरें फैली हुई हैं, हाथ उम्मीद और दृढ़ता के मिश्रित कंपन से कांप रहे हैं। प्रकाश एक छोटे से डेस्क पर पड़ता है, जिस पर कागज़ों का ढेर, एक पुराना नोटबुक और एक पेन रखा है। आवाज़ जुनून से उठती है, फिर धीरे से, गुप्त और आत्मीय स्वर में बदल जाती है।)
क्या आपको लगता है कि महानता अचानक आती है? कि सफलता दरवाज़े पर तूफ़ान बनकर दस्तक देती है, चमकती और अंधा कर देती है, दुनिया को दंग कर देती है? नहीं… नहीं, यह किसी एक क्षण की चमक में जन्म नहीं लेती। यह धीरे-धीरे, चुपचाप, आत्मा में तराशी जाती है… एक छोटे कदम के ज़रिए… रोज़… हर घंटे…
(रुकते हैं, हाथों को देखते हैं।)
हर दिन, मैं उठता हूँ। मैं खड़ा होता हूँ। मैं गिरता हूँ… मैं ठोकर खाता हूँ… लेकिन हार नहीं मानता। एक पन्ना लिखा। एक समस्या हल की। एक वादा निभाया। छोटे, लगभग अदृश्य विजय। लेकिन ये विजय हैं। ये ईंटें हैं। ये संरचना हैं, जिस पर सपनों की इमारत खड़ी होती है।
(आवाज़ उठती है, ज़्यादा तीव्र।)
समझो! सफलता… ओह, वह शब्द जो चमकता है, जो अंधा कर देता है! सफलता किसी एक बड़ी जीत या ज़ोरदार तालियों में नहीं है। यह वह चुपचाप, अदृश्य कर्म है जिसे हम रोज़ करते हैं। यह उस अनंत निरंतरता में है, जब हम दिखाई नहीं देते… जब हम हार नहीं मानते। यह चुपचाप पसीना बहाना है, गुप्त आंसू बहाना है।
(आगे कदम बढ़ाते हैं, लगभग विनती करते हुए।)
हर छोटा प्रयास… जो रोज़ दोहराया जाए… यह बिलकुल छोटा नहीं है। यह उपलब्धि की गुप्त मुद्रा है। हर पन्ना लिखा, हर किलोमीटर दौड़ा, हर दिया गया स्नेह, हर सामना की गई बाधा… ये जमा होते हैं। ये बढ़ते हैं। और एक दिन… एक अद्भुत दिन… आप यह पाएंगे कि वह पहाड़ जिसे आप असंभव मानते थे, आपके पैरों के नीचे राह बन चुका है।
(रुकते हैं, गहरी सांस लेते हैं, आवाज़ अब धीरे और फुसफुसाती हुई है।)
तो, कल फिर उठो। और अगले दिन। और उसके बाद के दिन। उन कदमों को लेते रहो। अदृश्य में अपना दिल डालते रहो। क्योंकि दुनिया उन घंटों को याद नहीं करेगी जो तुमने गिने… लेकिन तुम्हारी ज़िंदगी याद रखेगी। और यही… यही है सफलता।
(आकृति डेस्क पर बैठती है, नोटबुक खोलती है, और फिर से लिखना शुरू करती है, जैसे ही प्रकाश धीरे-धीरे मद्धम होता है।)

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