(मंच पर एक अकेली आकृति खड़ी है, दूर तक नजरें फैली हुई हैं, हाथ उम्मीद और दृढ़ता के मिश्रित कंपन से कांप रहे हैं। प्रकाश एक छोटे से डेस्क पर पड़ता है, जिस पर कागज़ों का ढेर, एक पुराना नोटबुक और एक पेन रखा है। आवाज़ जुनून से उठती है, फिर धीरे से, गुप्त और आत्मीय स्वर में बदल जाती है।)
क्या आपको लगता है कि महानता अचानक आती है? कि सफलता दरवाज़े पर तूफ़ान बनकर दस्तक देती है, चमकती और अंधा कर देती है, दुनिया को दंग कर देती है? नहीं… नहीं, यह किसी एक क्षण की चमक में जन्म नहीं लेती। यह धीरे-धीरे, चुपचाप, आत्मा में तराशी जाती है… एक छोटे कदम के ज़रिए… रोज़… हर घंटे…
(रुकते हैं, हाथों को देखते हैं।)
हर दिन, मैं उठता हूँ। मैं खड़ा होता हूँ। मैं गिरता हूँ… मैं ठोकर खाता हूँ… लेकिन हार नहीं मानता। एक पन्ना लिखा। एक समस्या हल की। एक वादा निभाया। छोटे, लगभग अदृश्य विजय। लेकिन ये विजय हैं। ये ईंटें हैं। ये संरचना हैं, जिस पर सपनों की इमारत खड़ी होती है।
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