हवा में महल बनाना (एक नाट्य-स्वगत) Poem by ashok jadhav

हवा में महल बनाना (एक नाट्य-स्वगत)

(मंच लगभग खाली है। केवल एक कुर्सी रखी है। वक्ता मंच के बीच खड़ा है, हाथ ऐसे उठाए हुए मानो अदृश्य मीनारें गढ़ रहा हो। रोशनी हल्की, स्वप्निल है।)
मैंने उन्हें बड़े ध्यान से बनाया—
पत्थर दर पत्थर,
आशा दर आशा,
हालाँकि मेरे पैरों के नीचे कोई ज़मीन नहीं थी।
हाँ, आज मैं स्वीकार करता हूँ।
मैंने हवा में महल बनाए।
भव्य महल।
निश्चितता की मीनारें,
तालियों से गूँजते विशाल कक्ष,
उन भविष्य की ओर खुलती खिड़कियाँ
जो सुबह की रोशनी की तरह चमकते थे।
(ठहराव। वह धीरे-धीरे हाथ नीचे करता है।)
वे कितने वास्तविक लगते थे!
कल्पना में कितने ठोस,
अपने वादों में कितने विश्वसनीय।
मैं रातों में उनके गलियारों में टहलता,
सफलता से बातचीत करता,
उस व्यक्ति से परिचय कराता
जो बनने को मैं निश्चित था।
और मैं विश्वास क्यों न करता?
दुनिया हमें सपने देखना सिखाती है।
वह दृष्टि, महत्वाकांक्षा और साहस की सराहना करती है।
पर यह चेतावनी देना भूल जाती है
कि वास्तविकता से बँधे बिना सपने
बिना आवाज़ के भी ढह सकते हैं।
(वह आगे बढ़ता है।)
मैंने अपना जीवन
किसी परीकथा की तरह योजनाबद्ध किया—
उबाऊ अध्यायों को छोड़ते हुए,
अवरोधों को नज़रअंदाज़ करते हुए,
यह मानते हुए कि केवल प्रयास ही
गुरुत्वाकर्षण को चुनौती दे देगा।
मैंने कहा, "सब ठीक हो जाएगा।"
मैंने कहा, "मैं अलग हूँ।"
मैंने कहा, "असफलता दूसरों के लिए है।"
ओह, आत्मविश्वास कितनी आसानी से
नाज़ुकता को ढँक लेता है।
(ठहराव। रोशनी थोड़ी मंद होती है।)
वास्तविकता चुपचाप आई।
उसने दस्तक नहीं दी।
उसने अपना परिचय नहीं दिया।
वह बस इंतज़ार करती रही—
जब तक हवा का रुख बदला।
एक छोटा-सा बदलाव।
एक चूक।
और मेरे महल—
वे भव्य इरादों की मीनारें—
काँप उठे, टूटे,
और हवा में विलीन हो गए।
(स्वर कसैला हो जाता है।)
क्या तुम जानते हो
एक सपने के ढहने की आवाज़ कैसी होती है?
वह ऊँची नहीं होती।
वह एक फुसफुसाहट होती है।
वह वह क्षण होता है
जब तुम्हें एहसास होता है
कि केवल कल्पना
भार नहीं उठा सकती।
मैं वहाँ खाली हाथ खड़ा था,
ऐसे नक़्शों को घूरता हुआ
जिन्हें कोई ज़मीन थाम नहीं सकती थी।
(वह अपनी हथेलियों को देखता है।)
मुझे मूर्ख महसूस हुआ।
नंगा।
शर्मिंदा।
मानो ज़्यादा चाहना
कोई अपराध हो।
लोगों ने सिर हिलाए।
"अवास्तविक, " उन्होंने कहा।
"भोले।"
"बड़े हो जाओ।"
पर उनमें से किसी ने नहीं देखा
कि उन महलों ने मुझे क्या दिया—
दीवारों से परे सोचने का साहस,
बाड़ों से आगे देखने की भूख।
(ठहराव। स्वर नरम हो जाता है।)
शायद गलती सपने देखने में नहीं थी,
बल्कि नींव बनाना भूल जाने में थी।
क्योंकि हवा में बने महल भी
ऊँचा उठने की चाह से ही जन्म लेते हैं।
(वह सीधा खड़ा होता है।)
मैं अब बड़ा हो गया हूँ।
लोग कहते हैं—ज़्यादा समझदार।
पर मैंने सपने देखना नहीं छोड़ा।
मैंने बस यह सीखा है
कि आँखें आकाश में रखें
और पैर ज़मीन पर।
मैं आज भी मीनारें बनाता हूँ—
पर अब मिट्टी परखता हूँ।
मैं आज भी पुल बनाता हूँ—
पर अब दूरी नापता हूँ।
(स्वर दृढ़ होता है।)
क्योंकि कर्म के बिना सपने
मात्र भ्रम हैं।
और सपनों के बिना कर्म
एक कारागार।
तो हँसने दो।
चेतावनी देने दो।
संदेह करने दो।
मैं निर्माण करता रहूँगा—
हवा में महल नहीं,
बल्कि ऐसी संरचनाएँ
जो आकाश की ओर उठ सकें।
(ठहराव। वह एक बार फिर ऊपर देखता है।)
आख़िरकार,
हर ठोस इमारत
कभी एक असंभव विचार ही थी।
(रोशनी धीरे-धीरे मंद पड़ जाती है।)

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