(मंच मंद प्रकाश में डूबा है। एक कुर्सी मंच के मध्य से थोड़ी हटकर रखी है। वक्ता टहलता है, फिर रुक जाता है, मानो किसी ऐसी आवाज़ को सुन रहा हो जिसे केवल वही सुन सकता है।)
लोग मुझसे कहते रहते हैं—
"शांत हो जाओ। सब सँभाल लो।"
मानो हर तूफ़ान
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